मानव हृदय की क्रिया विधि-

मानव हृदय की क्रिया विधि-

दायां वेंट्रिकल फुफ्फुसीय वाल्व के माध्यम से ऑक्सीजन-गरीब रक्त को फेफड़ों में पंप करता है। बायां अलिंद फेफड़ों से ऑक्सीजन युक्त रक्त प्राप्त करता है और इसे माइट्रल वाल्व के माध्यम से बाएं वेंट्रिकल में पंप करता है। बायां वेंट्रिकल महाधमनी वाल्व के माध्यम से ऑक्सीजन युक्त रक्त को शरीर के बाकी हिस्सों में पंप करता है।

1) हृदय की आन्तरिक संरचना

हृदय वक्षगुहा में फेफडों के मध्य स्थित होता है। यह दोहरे हृदयावरण (pericardium)  से घिरा होता है। दोनों झिल्लियों के मध्य हृद्यावरणीय तरल (pericardial fluid) भरा होता है।

अलिन्द (auricle) एक अन्तरा-असिन्द पट (inter auricular septum) द्वारा दाएँ तथा बाएँ अलिन्द में बँटा होता है। अन्तरा- अलिन्द पट पर एक अण्डाकार गट्टा होता है जिसे फोसा ओवेलिस (fossa ivalis) कहते है। दाएँ अलिन्द में पश्च महाशिरा तथा अग्र महाशिरा के छिद्र होते हैं।

पश्च महाशिरा के छिद्र पर यूस्टेकियन कपाट (eustachian valve) होता है। अग्र महाशिरा के छिद्र के ही पास एक छिद्र कोरोनरी साइनस (coronary sinus) होता है। इस छिद्र पर कोरोनरी कपादृ या थिबेसिंयन कपाट (auriculo ventricular node) होती है। दाएं अलिन्द में अग्र तथा  पश्च महाशिराओं के छिद्रों के समीप स्पन्दन केन्द्र या पेस मेकर (pace maker) होता है। इससे हृदय में संकूचन प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। अन्तरा-अलिन्द पट पर अलिन्द-निलय गाँठ (auriculo ventricular node) होती है। यह हृदय संकुचन की तरंगों को निलय में प्रेषित करती है। बाएँ अलिन्द में दोनो फुफ्फुसीय शिराएँ एक सम्मिलित छिद्र द्वारा खुलती है।

एक अन्तरा-निलय पट (inter-ventricular septum) निलय को दाएँ व बाएँ निलय में बाँटता है। निलय का पेशी स्तर अलिन्द की अपेक्षा बहुत मोटा होता है। बाएँ निलय का पेशी स्तर सबसे  अधिक मोटा होता है। निलय की भिति में स्थित मोटे पेशी स्तम्भों को पैपीलरी पेशियों (papillary muscles) कहते है। दाएँ निलय से पल्मोनरी चाप निकलती है। यह अशुद्ध रुधिर को फेफडों में  पहुंचाती है। बाएँ निलय से कैरोटिको सिस्टैंमिक चाप निकलती है, जो सारे शरीर में शुद्ध रुधिर पहुंचाती है। इन चापों के आधार पर तीन-तीन छोटे अर्द्धचन्द्राकार कपाट (semilunar valves) पाए जाते हैं|

मानव हृदय की क्रिया विधि-
मानव हृदय की क्रिया विधि-

2) मानव ह्रदय की क्रियाविधि

हृदय का प्रमुख कार्य शरीर के विभिन्न भागों में रुधिर पहुँचाना है। हृदय ही शरीर के विभिन्न भागों से रुधिर को ग्रहण भी करता हैं। हृदय शरीर में रुधिर को पम्प करने का कार्य करता है। इस कार्य के लिए हृदय हर समय सिकुड़ता  तथा शिथिल होता रहता है। हृदय के सिकुड़ने को प्रकुंचन (सिस्टोल) तथा शिथिल होने को अनुशिथिलन (डायस्टोल) कहते हैं।

अलिन्दो के शिथिल होने से रुधिर महाशिराओं से आकर अलिन्दों  में, जबकि निलयों के शिथिल होने से रुधिर अलिन्दो से निलयों में एकत्र हो जाता है। जब हदय के इन भागों में प्रकुंचन होता है तो रुधिर अलिन्दों से निलय में तथा निलयों से महाधमनियों में धकेल दिया जाता है। अलिन्दों तथा निलयों में ये क्रियाएँ क्रमश: तथा एक के बाद एक होती है।

दाया अलिंद दाएं निलय में त्रिवलन कपाट (Tricuspid Valve) द्वारा खुलता है जबकि बाया अलिंद बाएं निलय मे  द्विवलन कपाट (मिट्रल वाल्व Bicuspid or mitral valve) द्वारा खुलता है। यह कपाट रुधिर को अलिंद से निलय  में आने तो देते  है किंतु वापस नहीं जाने देते। ये कपाट हृद –सूत्रों (chordae tendinae ) द्वारा निलय की दीवार से जुड़े रहते हैं। दाएं निलय  से पलमोनरी चाप (Pulmonary Arch) निकलता है जो पलमोनरी धमनियों में विभाजित होता है । ये धमनियाँ रुधिर को फेफड़ों तक ले जाती हैं ।
बाएँ निलय से केरोटिको  -सिस्टेमिक -चाप (Carotico-systemic-

Arch)निकलता है जो ऑक्सिजन युक्त रुधिर को शरीर के अन्य भागों तक पहुंचाता हैं। इन चापों के मुख पर तीन छोटे छोटे अर्ध-चंद्राकार वाल्व (Semi-lunar-valve) होते हैं जो रुधिर का पश्च -प्रवाह रोकते हैं।

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