Ncrt Class 10 वन एवं वन्य जीवन संसाधन

Ncert Class 10 वन एवं वन्य जीवन संसाधन

वन्य जीवन संसाधन– इस ग्रह पर हम सूक्ष्म-जीवाणुओं और बैक्टीरिया (Bacteria), जोक से लेकर वटवृक्ष, हाथी और ब्लू व्हेल(Blue whale) तक करोड़ों दूसरे जीव धारियों के साथ रहते हैं। यह पूरा आवासीय स्थल जिस पर हम रहते हैं, अत्यधिक जैव-विविधताओं से भरा हुआ है। मानव और दूसरे जीवधारी(Living) एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं, जिसका हम मात्र एक हिस्सा है और अपने अस्तित्व के लिए इसके विभिन्न तत्वों पर निर्भर रहते हैं। उदाहरण के लिए वायु(Air) जिसमें हम सांस लेते हैं, जल जिसे हम पीते हैं और मृदा(Soil) जो अनाज पैदा करती है, जिसके बिना हम जीवित(Living) नहीं रह सकते, पौधे, पशु और सूक्ष्मजीवी इनका पुनः सृजन(Regeneration) करते हैं। वन पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। क्योंकि यह प्राथमिक मैन्युफैक्चर(Manufacture) हैं। जिन पर दूसरे सभी वन्य जीवन संसाधन निर्भर करते हैं।

वन्य जीवन और कृषि फसल उपजातियों में अत्यधिक जैव विविधता पाई जाती है यह आकार(Size) और कार्य में विभिन्न हैं परंतु अंतनिर्भिताओ के जटिल(Hard) जाल द्वारा एक तंत्र में गुंथी हुई है।

भारत में वन्य जीवन संसाधन

यदि आप आसपास नजर दौड़ते हैं तो आप पाएंगे कि कुछ ऐसे प्राणी और पौधे जो आपके एरिया(Area) में ही पाए जाते हैं। वास्तव में भारत, जैव विविधता के संदर्भ में वर्ल्ड(world) के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। यहां विश्व की सारी जैव उपजातियों की 8% संख्या (लगभग 16 लाख) पाई जाती है। ये अभी खोजी जाने वाली उपजातियों (Subcastes) से दो या तीन गुना है। आप पहले ही भारत में पाए जाने वाले वनों और वन्य जीवन संसाधन के एरिया(Area) और किस्मों के बारे में पड़ चुके हैं। ये विविध वनस्पतिजात और प्राणीजात हमारे हर डेली(Daily) के जीवन में इतने गूंथे हूए है कि इनकी कद्र ही नहीं करते। परन्तु पर्यावरण(Natural) के प्रति हमारी असंवेदना के कारण पिछले कुछ टाइम(Time) से इन संसाधनों पर भारी प्रेशर (Pressure) बड़ा है।

क्रियाकलाप

अपने एरिया(Area) में मानव और प्रकृति के संबंध भाई संबंधों पर प्रचलित स्टोरी(story) के बारे में पता लगाइए।

कुछ अनुमान यह कहते हैं कि भारत में 10% वन्य वनस्पतिजात और 20% स्तनधारियों को लुप्त होने का खतरा है। इनमें से कई उपजातिया है तो नाजुक अवस्था में है और लुप्त होने के कगार पर है। इनमें चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख, पहाड़ी कोयल(Quail) और जंगली चित्तीदार उल्लू और मधुका इनसीगनीस(महुआ की जंगली किस्म) और हूबार्डिया हेप्टान्यूरॉन (घास की प्रजाति) जैसे पौधे शामिल है। वास्तव में कोई भी नहीं बता सकता कि अब तक कितनी प्रजातियां लुप्त हो चुकी है। आज हमारा ध्यान अधिक बड़े और दिखाई देने वाले वन्य जीवन संसाधन और पौधे के लुप्त(Missing) होने पर अधिक केंद्रित है परंतु छोटे प्राणी जैसे कीट और पौधे भी इंपॉर्टेंट(Importent) होते हैं।

लुप्त होते वन

भारत में जिस पैमाने पर वन कटाई हो रही है, यह विचलित कर देने वाली बात है। देश में वन आवरण के अंतर्गत अनुमानित 79,42 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल है। यह देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 24.16 प्रतिशत हिस्सा है। (सघन वन 12.2 प्रतिशत, खुला वन 9.14 प्रतिशत और 0.14 प्रतिशत)। स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (2015) के अनुसार।

वन एवं वन्य जीवन संसाधन, कक्षा-10, पाठ-1
वन एवं वन्य जीवन संसाधन

वर्ष 2013 में सघन वनों के क्षेत्र में 3,775 वर्ग किमी. की वृद्धि हुई है। परंतु वन क्षेत्र में यह वृद्धि वन प्रोटेक्शन(Protection) उपायों, प्रबंधन की भागीदारी तथा वृक्षारोपण से हुई है।

आओ हम विभिन्न प्रकार के पौधे और प्राणियों की जातियों के बारे में पता लगाएं। अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण(IUCN) संघ के अनुसार इनको निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

इंडिया (India) में पाए जाने वाले कुछ वन्यजीवों(Wildlife) की जातियां

सामान्य जातियां– ये वे जातियां हैं जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए सामान्य मानी जाती है, जैसे- पशु, साल, चिड और क्रंटक(Krantak) इत्यादि।

संकटग्रस्त जातियां– ये वे जातियां हैं जिनके लुप्त होने का खतरा है। जिन विषम परिस्थितियों के कारण इनकी संख्या कम हुई है, यदि वे जारी रहती है तो इन जातियों का जीवित रहना कठिन(Hard) है। काला हिरण, मगरमच्छ (crocodile), भारतीय जंगली गधा, गैंडा (Rhinoceros), शेर-पूछ वाला बंदर, संगाई (मणिपुरी हिरण) इत्यादि इस प्रकार की जातियों(Castes) के उदाहरण है।

सुभेध (Vulnerable) जातियां– ये वे जातियां हैं जिनकी संख्या घट रही है। यदि इनकी संख्या पर विपरीत प्रभाव डालने वाली परिस्थितियां नहीं बदली जाती और इनकी संख्या घटती रहती है तो यह संकटग्रस्त जातियों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगी। नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा नदी की डॉल्फिन(Dolphin) इत्यादि इस प्रकार की जातियों के उदाहरण है।

दुर्लभ जातियां– इन जातियों की संख्या बहुत कम या सुभेध है और यदि इनको प्रवाहित करने वाली विषम परिस्थितियां नहीं परिवर्तित होती तो यह संकटग्रस्त जातियों की श्रेणी में आ सकती हैं।

स्थानिक जातियां– प्राकृतिक या भौगोलिक सीमाओं से अलग से क्षेत्रों में पाए जाने वाली जातियां अंडमानी टील(Teal), निकोबारी कबूतर, अंडमानी जंगली सूअर और अरुणाचल के मिथुन इन जातियों के उदाहरण हैं।

लुप्त जातियां– ये वे जातियां हैं जो इनके रहने के आवासों में खोज करने पर अनुपस्थित पाई गई है। यह उपजातियां स्थानीय एरिया(Area), प्रदेश, देश, महाद्वीपीय या पूरी पृथ्वी से ही लुप्त हो गई है। ऐसी उपजातियों(Subcastes) में एशियाई चीता और गुलाबी सिर वाली बत्तख शामिल है।

एशियाई चीता- कहां चला गया?

भूमि पर रहने वाला वर्ल्ड(World) का सबसे तेज स्तनधारी प्राणी, चीता(Cheetah), बिल्ली परिवार का एक यूनिक(Unique) और विशिष्ट मेंबर(Member) है जो 112 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से दौड़ सकता है। लोगों को आमतौर पर भ्रम(Myth) रहता है कि चीता एक तेंदुआ होता है। चीते(Leopard) की विशेष पहचान (recognise) उसकी आंख के कोने से मुंह तक नाक(Nose) के दोनों ओर फैली आंसुओं के लकीरनुमा निशान है। 22वी शताब्दी से पहले चीते अफ्रीका(Africa) और एशिया में दूर-दूर तक फैले हुए थे। परंतु इसके आवासीय क्षेत्र और शिकार की उपलब्धता कम होने से लगभग लुप्त हो चुके हैं। भारत(India) में तो यह जाति बहुत पहले, 1952 में लुप्त घोषित कर दी गई थी।

यदि आप चारों ओर नजर दौड़ाएंगे में तो आप पाएंगे कि किस प्रकार हमने प्रकृति(Nature) को संसाधनों में परिवर्तित कर दिया है।

वन एवं वन्य जीवन संसाधन, कक्षा-10, पाठ-1
वन एवं वन्य जीवन संसाधन

हमें लकड़ी, छाल, पत्ते, रबड़, मेडिसिन(Medicine), भोजन, ईंधन, चारा, खाद इत्यादि प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से वनों और वन्य जीवन संसाधन(Life) से प्राप्त होता है इसलिए हम ही हैं जिन्होंने वन और वन्य जीवन संसाधन को लॉस(Loss) पहुंचाया है। भारत में वनों को सबसे बड़ा नुकसान उपनिवेश काल में रेल लाइन, कृषि, व्यवसाय, वाणिज्य वानिकी और खनन क्रियाओं में वृद्धि से हुआ। सुवंत्रता प्राप्ति के बाद भी वन्य जीवन संसाधन के सिकुड़ने से कृषि का फैलाव महत्वपूर्ण कारकों में से एक रहा है। भारत में वन सर्वेक्षण के अनुसार 1951 और 1980 के बीच लगभग 26,200 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कृषि भूमि में परिवर्तित किया गया। अधिकतर जनजाति क्षेत्रों, विशेषकर पूर्वोत्तर और मध्य भारत में स्थाननंत्री(झूम) खेती अथवा ‘स्लैश और बर्न’ Slash or Burn खेती के चलते वनों की कटाई(Harvesting) या निम्नीकरण हुआ है।

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