यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति का क्या योगदान था?

यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति का योगदान

राष्ट्र के विचार को बनाने में संस्कृति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई: संगीत, कहानियों, कला और कविता ने राष्ट्रवादी भावनाओं को आकार देने और व्यक्त करने में मदद की। यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति के योगदान को समझने के लिए यूनान, पोलैंड और जर्मनी के तीन उदाहरण नीचे दिए गए हैं।

जैसे, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद राष्ट्र की पहचान, इतिहास और नियति की एक दृष्टि प्रदान करने के लिए निर्धारित होता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रमुख एजेंट बुद्धिजीवी और कलाकार हैं, जो राष्ट्र के अपने दृष्टिकोण को व्यापक समुदाय तक पहुँचाना चाहते हैं।

अपने आंतरिक मूल्य के अलावा, संस्कृति महत्वपूर्ण सामाजिक और आर्थिक लाभ प्रदान करती है। बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य, बढ़ी हुई सहनशीलता और दूसरों के साथ आने के अवसरों के साथ, संस्कृति हमारे जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाती है और व्यक्तियों और समुदायों दोनों के लिए समग्र कल्याण को बढ़ाती है।

रूमानीवाद :

रूमानीवाद एक संस्कृति आंदोलन था जो एक विशेष प्रकार की राष्ट्रीय भावना का विकास करना चाहता था। रुमानी कलाकारों तथा कवियों ने तर्क वितर्क और विज्ञान पर बल देने के स्थान पर अंतर्दृष्टि और रहस्यवादी भावनाओं पर बल दिया । वह एक सामूहिक विरासत की अनुभूति और एक साझे सांस्कृतिक अतीत को राष्ट्र का धर्म बनाना चाहते थे।

जर्मन दार्शनिक योहान गॉटफ्रीड जैसे रूमानी चिंतकों के अनुसार सच्ची जर्मन संस्कृति उसके आम लोगों में मौजूद है। उनका विश्वास था कि राष्ट्र की सच्ची आत्मा लोकगीतों, जन काव्य और लोकनृत्यों मैं निहित होती है। लोक संस्कृति के इन घटकों को एकत्रित और अंकित करना राष्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक.

यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति का योगदान
यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति का योगदान

स्थानीय बोलियों तथा लोक साहित्य :  

राष्ट्रवाद के विकास के लिए स्थानीय बोलियों पर बल और स्थानीय लोक साहित्य को एकत्रित किया गया । इसका उद्देश्य आधुनिक राष्ट्र संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना था। यह बात उचित रूप से पोलैंड पर लागू होती है ।

इस देश का 18 वीं शताब्दी के अंत में रूस , प्रशा और ऑस्ट्रेलिया जैसी बड़ी शक्तियों ने विभाजन कर दिया था। भले ही पोलैंड अब स्वतंत्र भू क्षेत्र नहीं था , तो भी संगीत और भाषा के माध्यम से वहां राष्ट्रीय भावना को जीवित रखा गया।

उदाहरण के लिए कैरोल कुर्पिस्की ने अपने आॅपेरा और संगीत से राष्ट्रीय संघर्ष के महत्व को बताया और पोलेनेस  तथा माजुरका जैसे लोक नृत्यों को राष्ट्रीय चिन्हों में बदल दिया।

भाषा

राष्ट्रीय भावनाओं के विकास में भाषा ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया । रूस के अधीन पोलैंड में पॉलिश भाषा को स्कूलों में बलपूर्वक हटा दिया गया था । इसके स्थान पर लोगों पर रूसी भाषा का प्रयोग किया जाने लगा। इसके फलस्वरूप 1831 में वहां रूस के विरोध एक सशस्त्र विद्रोह हुआ । इस विद्रोह को बलपूर्वक  कुचल दिया गया।

इसके बावजूद अनेक सदस्यों ने राष्ट्रीयवादी विरोध के लिए भाषा को अपने शस्त्र बनाया। चर्च के आयोजनों और संपूर्ण धार्मिक शिक्षा में पॉलिश भाषा का प्रयोग किया गया । इसके फलस्वरूप बंदी बनाकर बड़ी संख्या में पादरियों और बिशपों को  साइबेरिया भेज दिया क्योंकि उन्होंने रूसी भाषा का प्रचार करने से मना कर दिया था। इस तरह पॉलिश भाषा रूसी प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बन गई।

आशा है कि है उत्तर आपकी मदद करेगा।

यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति का योगदान
यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में संस्कृति का योगदान

इस पाठ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर-

प्रश्न 1: फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान का भाव पैदा करने के लिए फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने क्या कदम उठाए?

उत्तर: फ्रांसीसी लोगों के बीच सामूहिक पहचान का भाव पैदा करने के लिए फ्रांसीसी क्रांतिकारियो ने कई कदम उठाए। उन्होंने इसके लिए रोमांटिसिज्म का सहारा लिया। रोमांटिसिज्म एक सांस्कृतिक आंदोलन था जो एक खास तरह की राष्ट्रवादी भावना का विकास करना चाहता था। रोमांटिक कलाकार सामान्यतया तर्क और विज्ञान को बढ़ावा देने के खिलाफ होते थे। इसके बदले वे भावनाओं, अंतर्ज्ञान और रहस्यों अधिक महत्व देते थे।

राष्ट्र के आधार के रूप में उन्होंने साझा विरासत और सांस्कृतिक धरोहर की भावना को अधिक बल दिया। राष्ट्रवादी भावनाओं को बल देने में भाषा ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोगों में राष्ट्र की भावना को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पूरे फ्रांस में फ्रेंच भाषा को मुख्य भाषा की तरह बढ़ावा दिया गया। पोलैंड में रूसी आधिपत्य के खिलाफ विरोध के लिए पॉलिश भाषा का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया गया।

प्रश्न 2: मारीआन और जर्मेनिया कौन थे? जिस तरह उन्हें किया गया उसका क्या महत्व था?

उत्तर: फ्रेंच राष्ट्र को मारिआन का नाम दिया गया जिसे एक स्त्री के रुप में चित्रित किया गया। फ्रांस में राष्ट्र को मैरियेन का नाम दिया गया। यह ध्यान देने योग्य है कि मैरियेन इसाई महिलाओं का एक लोकप्रिय नाम है। मैरियेन के चरित्र चित्रण के लिए उदारवाद और प्रजातंत्र के रूपकों का प्रयोग हुआ, जैसे लाल टोपी, तिरंगा, कलगी, आदि।

लोगों में मैरियेन की पहचान घर करने के उद्देश्य से उसकी मूर्तियाँ बनीं और टिकटों और सिक्कों पर उसकी तस्वीर छापी गई। जर्मनी में जर्मेनिया को राष्ट्र का प्रतीक बनाया गया। जर्मनी में जैतून को बहादुरी का प्रतीक माना जाता है, इसलिए जर्मेनिया के सिर पर जैतून के पत्तों का ताज है।

प्रश्न 3: जर्मन एकीकरण की प्रक्रिया का संक्षेप में पता लगाएँ।

उत्तर: 1814 के वियेना कॉन्ग्रेस में जर्मनी की पहचान 39 राज्यों के एक लचर संघ के रूप में हुई थी। इस संघटण का निर्माण नेपोलियन द्वारा पहले ही किया गया था। 1848 के मई महीने में फ्रैंकफर्ट संसद में विभिन्न राजनैतिक संगठनों ने हिस्सा लिया।

उन्होंने एक जर्मन राष्ट्र के लिये एक संविधान की रचना की। उसके अनुसार जर्मन राष्ट्र का मुखिया कोई राजा होता तो संसद के प्रति जवाबदेह होता। ऑट्टो वॉन बिस्मार्क जो प्रसिया के मुख्यमंत्री थे जर्मन एकीकरण के मुख्य सूत्रधार थे। इस काम के लिए उन्होने प्रसिया की सेना और अफसरशाही की मदद ली थी। उसके बाद ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस से सात साल के भीतर तीन लड़ाइयाँ हुईं।

उन युद्धों की परिणति हुई प्रसिया की जीत मे जिसने जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया को संपूर्ण किया। 1871 के जनवरी महीने में वर्साय में हुए एक समारोह में प्रशा के राजा विलियम 1 को जर्मनी का शहंशाह घोषित किया गया।

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