विज्ञान पर 2 कविताएं | vigyan per 2 kavitaen | Kavita on vigyan

विज्ञान पर 2 कविताएं

हेलो दोस्तों मेरा नाम है भूपेंद्रसिंह और मैं उत्तराखंड का रहने वाला हूं। आज हम इस आर्टिकल में विज्ञान पर लिखी 2 कविताओं को आपको बताएंगे। इसलिए इस आर्टिकल को पूरा पढ़ें। और ऐसे ही आर्टिकल के लिए हमारी वेबसाइट पर जाएं।

सीखें हम विज्ञान

आओ गोलू, मोनू चम्पा
सीखें सब विज्ञान।
बिल्ली मौसी, कुत्ता भैय्या
या लो सच्चा ज्ञान।
सुनें पेड़-पौधों की वाणी
अपनाएँ विज्ञान।
अंधकार को दूर भगाएँ
विद्युत के अभियान।
जय, जय, जय विज्ञान।

बढ़ी उपज कण-कण हरियाली
मित्र बना विज्ञान।
टेलीविजन पहुँचकर घर-घर
मिटा दिया अज्ञान।
खोले बंद युगों के ताले
करके आविष्कार,
सैर हुई ग्रह-नक्षत्रों की
रचा नया संसार,
निर्भर इस पर भविष्य अपना
बना प्रकृति-वरदान।

कम्प्यूटर ने क्रांति मचाई
किए काम आसान।
अस्त्र, शस्त्र इसके संहारी
रखना इन पर ध्यान।
किये दुख, रोग हमारे
दूर दी मुख पर मुस्कान
भारी-भारी उद्योगों से

हुआ राष्ट्र-निर्माण।
मोटर सड़कों, रेल पटरियों
नभ पर उड़े सारे जग की
दूरी वाम की सारे जग की
धन्य धन्य खोले प्रकृति रहस्य रहे जो
गूँज उठा जय-गान।
सीखें हम विज्ञान।

ब्रह्माण्ड

मैं हूँ ब्रह्माण्ड यहाँ मेरा बिस्तार।
मैं हूँ रहस्यभरा नहीं आर-पार।
पृथ्वी से देखो तो दिन में हूँ नीला,
रातों में काला-सा अन्तरिक्ष टीला,
धरती से ऊपर है मेरा परिवार।
धूमकेतु, चाँद, सूर्य, पिण्ड, शून्य तारे,
बँधे सभी रोम, रोम, प्रलय तक हमारे,
नाप नहीं सका कोई मेरा आकार।
सूरज प्यारा बेटा, हरक्षण है जलता,
चन्दा छोटा उपग्रह, वसुधा-संग चलता,
आकर्षण डोरी से बाँधे सब द्वार।
सो जाते दिन नन्हें शिशुओं से तारे,
बहुत बड़े धरती से, युद्ध नहीं हारे,
सृष्टि नयी होती है मेरे भी पार।
मैं हूँ ब्रह्माण्ड यहाँ मेरा बिस्तार।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *